गोमती मइया की पुकार: अभी भी समय है, संभल जाओ!
प्रकृति से खिलवाड़ नहीं, उसके साथ सह-अस्तित्व ही सुरक्षित भविष्य का आधार है।
लखनऊ की जीवनरेखा गोमती नदी का बढ़ता जलस्तर और फैजुल्लागंज सहित कई इलाकों में बाढ़ जैसी स्थिति हमें एक बार फिर प्रकृति के साथ अपने संबंधों पर विचार करने के लिए विवश करती है। यह केवल जलस्तर बढ़ने की घटना नहीं, बल्कि एक ऐसा संदेश है, जिसे समझना आज हमारे लिए बेहद जरूरी है।

यदि गोमती मइया बोल पातीं, तो शायद अपने बच्चों से कहतीं— “मेरे बच्चों, अभी भी समय है, संभल जाओ! मैंने तुम्हें जीवन दिया, तुम्हारी प्यास बुझाई और तुम्हारी सभ्यता को अपने किनारों पर फलते-फूलते देखा। फिर तुमने मेरे अस्तित्व को ही क्यों भुला दिया? क्यों मेरे प्राकृतिक रास्तों को संकरा किया, मेरे किनारों पर अतिक्रमण किया और मेरे आँचल को प्रदूषण से भर दिया?”
नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति और प्रकृति की धड़कन हैं। जब हम प्राकृतिक जलमार्गों पर अतिक्रमण करते हैं, तालाबों को पाटते हैं, पेड़ों को काटते हैं और जल निकासी के रास्तों को बाधित करते हैं, तो हम अपने ही भविष्य के लिए संकट उत्पन्न करते हैं। अत्यधिक वर्षा के साथ ऐसी परिस्थितियाँ बाढ़ के जोखिम को और बढ़ा सकती हैं।
गोमती मइया मानो समझा रही हैं कि विकास अवश्य करो, लेकिन प्रकृति को नष्ट करके नहीं। ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कें और आधुनिक सुविधाएँ तभी सार्थक हैं, जब मनुष्य का जीवन सुरक्षित हो और पर्यावरण का संतुलन बना रहे। आखिर उस विकास का क्या अर्थ, जिसमें घर तो बन जाएँ, लेकिन नदियों के पास साँस लेने की जगह न बचे?
फैजुल्लागंज और अन्य प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों के लिए बाढ़ केवल पानी भरने की समस्या नहीं, बल्कि उनके घरों, आजीविका और सुरक्षा से जुड़ा गंभीर संकट है। ऐसे समय में प्रभावित लोगों की सहायता करना और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को मजबूत बनाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। साथ ही, भविष्य में ऐसी आपदाओं के जोखिम को कम करने के लिए नदी के प्राकृतिक प्रवाह, जल निकासी व्यवस्था, तालाबों और हरित क्षेत्रों का संरक्षण आवश्यक है।
गोमती मइया का संदेश केवल सरकार या प्रशासन के लिए नहीं, बल्कि हम सभी के लिए है। नदियों में कचरा न डालना, जल स्रोतों को स्वच्छ रखना, वृक्षारोपण करना और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार व्यवहार अपनाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
आज कल्पना कीजिए, गोमती मइया अपने बच्चों से कह रही हैं— “जीवन जीने के लिए बना है। इसे सुखपूर्वक जियो, प्रकृति को साथ लेकर जियो। मैं तुम्हारी शत्रु नहीं, तुम्हारे अस्तित्व का आधार हूँ। मेरे प्रवाह का सम्मान करो, मेरे किनारों को सुरक्षित रखो और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुंदर संसार छोड़कर जाओ।”
गोमती का बढ़ता जलस्तर हमें आत्ममंथन का अवसर देता है। प्रकृति के हर परिवर्तन को केवल उसका प्रकोप मानकर अपनी जिम्मेदारियों से बचा नहीं जा सकता। हमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संवेदनशीलता और दूरदर्शिता के साथ विकास की दिशा तय करनी होगी।
गोमती मइया की पुकार स्पष्ट है—अभी भी समय है, संभल जाओ! प्रकृति को बचाना किसी नदी पर उपकार करना नहीं, बल्कि अपने जीवन और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करना है।
नदी बचेगी, तो जीवन बचेगा; प्रकृति बचेगी, तो भविष्य बचेगा।
-डॉ. प्रगति शुक्ला Assistant Professor आई.ई.टी., डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय, लखनऊ
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